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स्कूल बस का रंग पीला क्यों होता है, कोई और कलर क्यों नहीं? डिटेल में जानिए इसकी वजह…

भारत ही नहीं, विलायत में भी स्कूल बसों का रंग पीला होता है. यह हैरानी वाली बात हो सकती है, लेकिन इसकी कई खास वजहें हैं. आपको इस बात की जानकारी होगी कि हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में रंग बड़ा रोल निभाते हैं. अलग-अलग रंग न हों तो जिंदगी शायद बदरंग हो जाए. कुछ यही बात बसों के रंग को लेकर भी है. तभी दुनिया के किसी कोने में चले जाएं, वहां स्कूल बसों को पीले रंग में भी पुताई करते हैं.

हर रंग की अपनी खास वेवलेंथ और फ्रीक्वेंसी होती है. इसी के आधार पर रंगों को देखा जाता है. कोई रंग चटख या मद्धिम इसी आधार पर देखा जाता है. उदाहरण के लिए लाल रंग को खतरे के रूप में या ट्रैफिक लाइट पर सिग्नल के तौर पर इस्तेमाल होता है, तो इसकी खास वजह है. इसी आधार पर यह भी जान सकते हैं कि आकाश का रंग नीला क्यों होता है और स्कूल बस हमेशा पीले रंग में ही क्यों होती है.

रंगों का समीकरण
रंगों का समीकरण समझने के लिए हमें VIBGYOR या विबग्योर का समीकरण समझना होगा. विबग्योर अलग-अलग सात रंगों के गठजोड़ को दर्शाता है. इसे वायलेट या बैंगनी, इंडिगो या आसमानी, ब्लू या नीला, ग्रीन या हरा, येलो या पीला, औरेंज या नारंगी और रेड या लाल रंग से समझ सकते हैं. लाल रंग की वेवलेंथ सबसे ज्यादा होती है, लिहाजा उसे सबसे ज्यादा दूर से देखा जा सकता है. इस हिसाब से उसका इस्तेमाल खतरे के संकेत या ट्रैफिक लाइट के रूप में होता है. सात रंगों की शृंखला में पीला रंग लाल रंग से नीचे होता है जिसकी वेवलेंथ लाल से कम होती है लेकिन ब्लू कलर से ज्यादा.

खतरे का निशान लाल रंग
लाल रंग सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता है, इसलिए खतरे के निशान के रूप में इसका सबसे अधिक इस्तेमाल होता है. इसके बाद अगर कोई रंग सबसे ज्यादा आकर्षित करता है तो वह है पीला. पीले रंग को दूर से भी देखा-पहचाना जा सकता है. इसी वजह से पीले रंग को स्कूल बसों पर लगाया जाता है, ताकि उसकी तरफ लोगों का अटेंशन बना रहे. पीले रंग को बारिश, कोहरा या धुंध में भी पहचाना जा सकता है. पीले रंग का लैटरल पेरीफेरल विजन पीले रंग की तुलना में लगभग सवा गुना ज्यादा होता है. इसलिए लाल रंग से भी जल्दी पीले रंग को देखा जा सकता है.

क्या है लैटरल पेरीफेरल विजन
यहां लैटरल पेरीफेरल विजन का मतलब है जिसे किनारे या अगल-बगल में भी आसानी से देखा जा सके. कोई व्यक्ति सामने देख रहा है और बगल से कोई पीले रंग की बस गुजर रही है, तो आसानी से इस रंग का आभास हो जाएगा. स्कूल बसों को पीले रंग से रंगने का यही कारण है कि सामने देखते हुए भी बगल का आभास हो सके और किसी दुर्घटना से बचा जा सके.

भारत में स्कूल बसों को पीला रंग मिला, इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक अहम फैसला है. बसों को पीले रंग में रंगने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ कई निर्देश जारी किए थे. ये निर्देश क्या थे, आइए जानते हैं-

बस के आगे-पीछे स्कूल बस लिखना आवश्यक है.

अगर किसी बस को हायर किया जा रहा है तो उस पर ‘ऑन स्कूल ड्यूटी’ लिखना अनिवार्य है.

स्कूल बस में फर्स्ट एड बॉक्स रखना जरूरी है.

स्कूल बस की खिड़कियों पर ग्रिल लगाना जरूरी है.

बस में अग्निशामक यंत्र लगाना जरूरी है.

बस पर स्कूल का नाम और टेलीफोन नंबर लिखा होना चाहिए.

बस के दरवाजे में लॉक लगा होना चाहिए.

स्कूल बैग बस में सुरक्षित रहे, इसके लिए सीट के नीचे जगह बनी होनी चाहिए.

स्कूल बस में स्कूल का एक अटेंडेंट होना चाहिए. बस में स्पीड गवर्नर लगे हों और अधिकतम स्पीड 40 किमी प्रति घंटा होना चाहिए.

अगर स्कूल कैब हो तो पीले रंग के साथ 150 एमएम की हरी पट्टी रंगी होनी चाहिए. हरी पट्टी कैब के चारों ओर बीच में रंगी होनी चाहिए. पट्टी पर स्कूल कैब लिखना जरूरी है.

स्कूली बच्चों की उम्र 12 साल से कम है तो स्कूल बस की सीटिंग कैपेसिटी से डेढ़ गुना से ज्यादा बच्चे नहीं बिठाए जा सकते. 12 साल से ऊपर के बच्चों को एक व्यक्ति के रूप में माना जाएगा.

स्कूल बस के ड्राइवर के पास कम से कम चार साल के लिए एलएमवी का ड्राइविंग लाइसेंस होना चाहिए. ड्राइवर को हल्के नीले रंग की शर्ट-पैंट और काले जूते पहनने होंगे. शर्ट पर नाम और आईडी लिखा होना चाहिए.

स्कूल बस में कितने बच्चे जा रहे हैं, उनका पूरा ब्योरा ड्राइवर के पास होना चाहिए. बच्चों के नाम, क्लास, घर का पता, ब्लड ग्रुप, चढ़ने-उतरने का स्थान, रूट प्लान आदि ड्राइवर के पास मौजूद हो.

स्कूल बस तक बच्चे को लेने कोई नहीं आए तो उसे स्कूल ले जाना होगा और उसके घर पर सूचना देनी होगी.