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BSP के नगर सेवा विभाग को हाईकोर्ट से झटका… अब तक हुई कार्रवाई को प्रभावितों ने बताया गलत, कहा-हम कब्जेधारक नहीं, लाइसेंसधारी हैं…

बीएसपी प्रबंधन के नगर सेवा विभाग को बड़ा झटका लगा है। उसने खुर्सीपार आईटीआई के आगे जिन पांच कंपनियों के खिलाफ बेजाकब्जा धारक बताते हुए कार्रवाई की थी, उस पर हाईकोर्ट ने पांचों कंपनियों को स्टे दे दिया है। इसके बाद बीएसपी की टीम यह आरोप लगाते हुए फिर से कार्रवाई करने पहुंची की उन्होंने उसके द्वारा लगाई गई सील को तोड़ दिया है। इस पर कंपनियों के संचालकों ने बीएसपी के अधिकारियों को हाईकोर्ट का स्टे आर्डर दिखाया। जिसके बाद उसे वहां से बैरंग वापस लौटना पड़ा। हरीश व संजय साधवानी का कहना है कि सील तोड़ने का आरोप पूरी तरह से गलत है। सील किसी अराजक तत्व द्वारा तोड़ी गई थी। इसकी उनके द्वारा लिखित शिकायत भी की गई है।

खुर्सीपार स्थित महालक्ष्मी ट्रेडिंग, बंसल ब्रदर्स, बंसल कॉमर्शियल, दुर्गा धरमकांटा के संचालक हरीश एवं संजय साधवानी, अनूप बंसल, राहुल बंसल और नरेश अग्रवाल ने भास्कर से बातचीत में बीएसपी की कार्रवाई को पूरी तरह से गलत बताया है। उनका कहना है कि, बीएसपी हमे कब्जाधारी बता रही है। ये पूरी तरह से गलत है। हम बीएसपी की लीज लाइसेंस पर व्यवसाय कर रहे हैं। हम लाइसेंसधारी हैं। हमें बीएसपी से व्यावसायिक उपयोग के लिए 1975 में जमीन अलॉट की गई थी। इसका 2004 तक बीएसपी को किराया भी अदा किया गया है और हर साल इसका रिन्यू भी होता रहा है।

2004 में बीएसपी ने अचानक मनमानी तरीके से किराया बढ़ा दिया गया। इस पर उन्होंने आपत्ति लगाई। उसके बाद से बीएसपी प्रबंधन ने किराया नहीं लिया है। हम 2004 से लेकर अब तक का किराया उचित ब्याज के साथ देने को तैयार हैं। इस बारे में हम लगातार बीएसपी प्रबंधन से लिखित व मौखिक वार्ता की जा रही है, लेकिन बीएसपी के अधिकारी केके यादव जबरदस्ती प्लॉट खाली कराने में लगे हुए हैं। इस बारे में बीएसपी के अधिकारी केके यादव ने कोई भी जवाब नहीं दिया है।

बीएसपी से प्रभावित लोगों के सवाल
बीएसपी प्रबंधन ने 1975 में खुर्सीपार में व्यावसायिक उपयोग के लिए जमीन अलॉट किया था। लाइसेंस पैटर्न में यह जमीन प्रभावितों को मिली थी। ऐसे में इन्हें कब्जाधारी कैसे कहा जा रहा है?

बीएसपी प्रबंधन 2004 तक लगातार किराया वसूल करता रहा। 2004 के बाद किराया वसूलने से मना कर दिया? आखिर ऐसा क्यों? जब किराया वसूल कर रहा था तो प्रभावित अवैध कब्जाधारी कैसे हुए?

बीएसपी प्रबंधन ने 9 सितंबर को मनमानी रूप से कार्रवाई क्यों की? जबकि, कार्रवाई से पहले कोई नोटिस और सूचना नहीं दी गई। जवाब पेश करने का मौका तक नहीं दिया गया? ये कार्रवाई कहां तक वैधानिक

वे नियमित रूप से नगर निगम भिलाई को प्रॉपर्टी टैक्स दे रहे हैं। बीएसपी प्रबंधन को किराया दे रहे हैं? आखिर दोनों सरकारी एजेंसी को टैक्स लगातार दिया जा रहा था। तो उन्हें अवैध कैसे कहा जा रहा है?

ये कार्रवाई द्वेषपूर्ण की गई है। सही मायने में जो कब्जेधारी हैं उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?

बीएसपी प्रबंधन की वो हर उचित शर्त को मानने को तैयार हैं, तो ऐसे में प्रबंधन इससे पीछे क्यों हट रहा है?

इस कार्रवाई से बीएसपी प्रबंधन और नगर निगम को राजस्व की हानि हो रही है।