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लेख : चलते रहना तब तक ,जब तक जीने का सलीका ना आ जाएं… चलते रहना तब तक ,जब तक तुम्हें चलना ना आ जाएं…

तुम चलते रहना

कोशिश के रास्ते में एक तरफ हार तो दूसरी ओर जीत पलते रहते हैं मगर साथ ही जन्म होता है डर का जो हमारे कोशिशों को अक्सर रोकने का प्रयास करता है ।

तो क्या ये डर बुरा है हमारे लिए?

नहीं ! डर हमें खुद को बेहतर बनाने के लिए बहुत जरुरी है और इसका अंत करना भी अनायास है क्योंकि डर के अंत से हमारा पतन शुरू हो सकता है,
यानी सही मात्रा में डर हमारे विकाश और ज़िन्दगी के लिए आवश्यक है,

इसका होना उतना ही जरूरी है जितना हमारे लिए सांसों का होना जरूरी है इसलिए खुद पे भरोसा और कुछ पाने की इच्छा डर से बड़ी हो तो अपने आप उस डर को समझते हुए आगे बढ़ा जा सकता है ।

कोशिशों को अपना मंजिल समझते हुए चलते रहना,
सफर परेशान करेगा मगर तुम चलते रहना,

आराम लेना थोडा, ठहरना भी लेकिन फिर चलते रहना,
हौसले डगमगायेंगे , रास्ते भी इतरायेंगे मगर तुम चलते रहना,

चलते रहना तब तक ,जब तक जीने का सलीका ना आ जाएं,
चलते रहना तब तक ,जब तक तुम्हें चलना ना आ जाएं ।

लेखक – आदित्य दुबे
छात्र – श्री शंकराचार्य टेक्निकल कैंपस

 

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